जो अगर तुम बात कह देती (नज़्म)
कुछ कहने के लिए तो
हिले थे लब तेरे
लफ्ज़ आते उनपे इससे पहले
तूने अपने होंठ सी दिए
पर मैने पढ़ ली वो लरज़िश,
वो जुंबिश जो तेरे लब पर थी
सच कहूं, जो बात कहते-कहते तुम रुक गई थी
अगर कह देती तो न जाने
कितने ही अनगिनत आफ़ताब
चमक उठते मेरे स्याह दिल में
तेरे लफ़्ज़ों की आवाजें
वो तेरी बात का लहजा
वो हर एक बात के पीछे
तेरी सांसों का वो पहरा
तेरी पलकों का झपकना
तेरे हाथों के इशारे
तेरी गुफ़्तार की अदायगी
तेरे दिलकश नज़ारे
कहर ढा जाते सच में
जो अगर तुम बात कह देती
(गुफ़्तार: गुफ्तगू करने का ढंग)
अभी एक रम्ज़ है
और इस रम्ज़ ने मुझे दीवाना बना रखा है
क्या कहूं कि तेरी इन मस्त मस्त आंखों ने
किस कदर से मुझे मस्ताना बना रखा है
(रम्ज़: गुप्त संकेत/इशारा/रहस्य)
हां मैने पढ़ ली थी वो बातें
पर मैं अभी भी उलझा हुआ हूं
कि शायद वो सच थीं या गुमान मेरा
काश तेरे इशारे के साथ-साथ आ जाता
कोई अच्छा सा बयान तेरा
मगर फिर ज़हन में मेरे
सरगोशी कहां होती
अभी जिस मौज में हूं मैं
वो मदहोशी कहां होती
जो अगर तुम बात कह देती।
-अनमोल
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