आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

जो दर्द है मेरा वही मेरी दवा है

                
                                                         
                            जो दर्द है मेरा वही मेरी दवा है
                                                                 
                            
किस बात की मुझको मिली ऐसी सज़ा है

चाहत है यही मैं भुला ही अब उसे दूं
पर वो है कि ऐसे मेरे दिल में बसा है

देखी नहीं उसने मेरी आहों की तपिश
जो देने लगा ज़ख्मों को मेरे हवा है

पर बात तो ऐसी कोई मैंने की नहीं
फिर यार हमारा यूं क्यों हमसे खफ़ा है

वो एक जो चेहरा मेरे दिल में है बसा
बाज़ार में चेहरा वही फिर से दिखा है

चेहरे से हटा दो अभी जुल्फ़ें ये ज़रा
क्यों चाँद सा मुखड़ा ये घटा में छुपा है

क्या क्या न सहे ज़ख्म यहां इश्क़ में हम
क्या जानता है तु, क्या ही तुझको पता है

बच इश्क़ की ज़हरीली तु राहों से ज़रा
इसमें ही यहां यार अभी तेरा भला है

हम तो वफ़ा के दीप जलाये खड़े हैं
पर दोस्त क्यों तूने सदा मुझको ठगा है।
-अनमोल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर