चलो हम भूल जाते हैं (नज़्म)
तेरी हर बात, तेरी याद
तेरे हिज्र में जो गुज़री रात
चलो हम भूल जाते हैं
जो वादे थे, जो कसमें थीं
मोहब्बत की जो रस्में थीं
अपने उल्फ़त के वो दिन-रात
चलो हम भूल जाते हैं
जहां छुप-छुप के मिलते थे
दिलों के फूल खिलते थे
मोहब्बत की वो कायनात
चलो हम भूल जाते हैं
वो झूठीं थीं या सच्ची थीं
मगर लगती तो अच्छी थीं
बेमतलब की वो सारी बात
चलो हम भूल जाते हैं
चलो हम भूल जाते हैं
अब उन सारी बातों को
जगाएंगी जो बेमतलब
हमें आकर के रातों को
सतायेंगी जो अब दिन रात
चलो हम भूल जाते हैं।
-अनमोल
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