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अब भला दिल को क्यों लगाऊं मैं

                
                                                         
                            अब भला दिल को क्यों लगाऊं मैं
                                                                 
                            
मुश्किलें अपनी क्यों बढ़ाऊं मैं

क्या मिलेगा मुझे यूं रोने से
बेवजह अश्क क्यों बहाऊं मैं

लोग चेहरे को पढ़ ही लेते हैं
अपने आँसू कहां छुपाऊं मैं

जबकि अरमान मर चुके हैं सब
उनको अब कैसे फिर जगाऊं मैं

जो भरम रख न पाए रिश्ते का
उनसे फिर किस तरह निभाऊं मैं

सोचता हूं कि अपने हाथों को
अब कहां जाके फिर दिखाऊँ मैं

जानता हूं कि टूट जाएंगे
अब नए ख़्वाब क्यों सजाऊं मैं

दिल में कोई नहीं सिवा तेरे
बात कैसे तुझे बताऊं मैं।
-अनमोल
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एक महीने पहले

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