आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

आँखें (पाबंद नज़्म)

                
                                                         
                            आँखें (पाबंद नज़्म)
                                                                 
                            

बस देखने को तुझको तरसती रहीं आँखें
कल याद तुझे करके बरसती रहीं आँखें
यादों का धुआं बाकी रहा आँख में मेरे
ता उम्र उसी में ही सुलगती रहीं आँखें

कल ख़्वाब मुझे आया क्या तेरा मेरे हमदम
खुशबू से ही तेरी ये महकती रहीं आँखें
यादों का उठा शोला सा दिल में भी हमारे
और फिर उन्हीं शोलों में दहकती रहीं आँखें

ग़म इश्क़ का है और ग़म-ए-दुनिया भी बहुत है
और बीच में उन्हीं के झुलसती रहीं आँखें
थीं वो झुकी पलकें कभी तेरी उठी पलकें
हर पल नया फिर दांव बदलती रहीं आँखें।
-अनमोल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर