मिट्टी से ये कैसा डर।
मिट्टी के मनुष्य सारे, मिट्टी का मेरा घर
मिट्टी से ही उठ बना हूं मैं उफन
मिट्टी मैं ही हो जाऊंगा मैं दफन
प्रेमसागर, प्रेमभाव मिट्टी सा है मेरा स्वभाव
मिट्टी के है अंश सभी फिर भी क्यों आपसी तनाव
जलहीन कहीं तो कहीं रक्तमग्न ये मिट्टी
युगों से स्थिर यहां अपनी धुन में मग्न मिट्टी
अंकित रहेंगे ये शब्द सदा, मृत्युलोक लौट जाऊं अगर
मिट्टी के है मनुष्य सारे, मिट्टी का है मेरा घर
मिट्टी से ये कैसा डर
मिट्टी से ये कैसा डर।।
अंकित।
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