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मेरी और मेरे दादाजी की बहुत बनती थी

                
                                                         
                            मेरी और मेरे दादाजी की बहुत बनती थी
                                                                 
                            
लोगों को भी हमारी दोस्ती खूब जँचती थी
दादाजी गिर गये थे एक बार पेड़ से
तो पैर हो गये थे उनके बड़े भारी हाथी के जैसे
इसलिए प्यार से सब लोग उन्हें हाथी दादा कहते थे
बच्चे उन्हें चिढ़ाते वो बच्चों को
पर बच्चों से सदा ही बहुत खुश रहते थे
गाँवभर के लोग हम दोनों भाइयों को
हाथी के नाती प्यार से कहते थे
मुझे अपने कंधो पर बिठाकर
पंगत खिलाने ले जाते थे
कहते थे एक रसगुल्ला अपनी दादी को लेते चलना
मैं उनके पीछे-पीछे दौड़कर सारा गांव घूम लेता था
मैं उनकी चिलम को खाली ही झूठमाट पी लेता था
खेत में जब वो हल चलाते तो मैं उस पर बैठा करता था
बैलगाडी पर भी वो मुझे आगे अपने साथ बिठाते थे
गाड़ी हाँकना भी उनने मुझको सिखाई थी
गाय बैल बछडो से दोस्ती उनने कराई थी
चौमासे में जब छप्पर को सही करना होता था
छप्पर को उतारने-चढ़ाने के लिए
मैं भी उनके साथ घर पर चढ़ जाता था
दादा के टिक्कड़ खाने में खूब मजा आता था
देव उठनी ग्यारस पर देव उठे गुन गाने गाओ
उनने मुझे सिखाया था
परोपकार और दानशीलता का पाठ उनने हमें पढ़ाया था
उनकी बदौलत जब पढ़ लिखकर हम दोनों भाई सरकारी शिक्षक बने
तो गर्व से दादाजी झूम उठे बोले मेरे नाती सफल हुये
अब लेकिन दादाजी हमें छोड़ गये
कितनी यादे देकर कितनी राहें देकर
कौन हमें कहेगा हाथी के नाती अब
हम नाती हुये अब बिन हाथी के
अब वो पल कभी ना लौटेंगे
ना वो बचपन लौटेगा
पर क्या लौटेंगे मेरे दादाजी ?
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2 महीने पहले

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