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वतन के लिए

                
                                                         
                            भाग रहे हम धन के पीछे
                                                                 
                            
भागना था भगवन के पीछे
भागना था वतन के पीछे
धन मकान सब रह जाएगा यहीं
साथ जाएगी नहीं यह मही
क्या किए
औरों के लिए
क्या किए
वतन के लिए
गरीब जन के लिए
क्या दिए
वतन को
जन जन को
क्या कभी हिसाब किए
नहीं न? तो हिसाब कीजिए
सत्कर्म सदा कीजिए
फल ईश्वर पर छोड़ दीजिए।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
5 घंटे पहले

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