स्वदेश प्यार से बढ़ कर कुछ भी तो नहीं है
पवन पानी भोजन बसन सभी तो यहीं है
जो स्वदेश से करे प्यार
ईश्वर उससे करते प्यार
बात असली समझना यही है
स्वदेश में रहूं मैं
सच सच सदा कहूं मैं
इससे बढ़ कर स्वर्ग सुख भी कुछ नहीं है
सबसे सुंदर मही है
और वह यहीं है
स्वर्ग तो स्वदेश में ही है
स्वदेश है मां इसके पैरों के रज में स्वर्ग ही है
करूं कुछ बड़ा बलिदान
करूं एकता का आह्वान
करूं सबका कल्याण
करूं स्वदेश से ऐसा प्यार
करूं ऐसे प्यार का इजहार
जैसे किया कोई नहीं है
सब कुछ मेरे लिए यही मही है
जो ज्ञान दायिनी, मोक्षदायिनी है
अन्न दायिनी,जल दायिनी,प्राण दायिनी है।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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