ज़िंदगी के पत्ते झड़ने लगे हैं,
अपने हमसे बिछड़ने लगे हैं।
बातें खामोशी में बदलने लगी हैं,
वक्त जैसे ढलने लगा है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X