आज अपराधी खुद को पुलिस बताते हैं
ऐसे छल कपट कर ठग कर ये जाते हैं
गिरगिट भी नहीं उतना रंग बदल पाते हैं
जितना लोग रंग बदल बदल कर आते हैं
पहले नेता होते थे त्यागी अब ठग कहलाते हैं
हर चुनाव में ये नए मुखौटे पहन कर आते हैं
किस पर करे कोई विश्वास आज के जमाने में?
एक पल भी नहीं लगता खुद को लुटवाने में
सदाचारी बच्चियों संग दुर्व्यवहार कर जाते हैं
सतर्क रहने के बाद भी बच कहां हम पाते हैं।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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