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परिचय बागी बलिया की

                
                                                         
                            मुझे गुलामी कभी स्वीकार नहीं
                                                                 
                            
कौन कहता है मुझे स्वदेश से प्यार नहीं?
हां,हां,हमें गुलामी क्षण भर स्वीकार नहीं
1957 में वीर मंगल पांडे बोला था
तब अंग्रेजों का शासन डोला था
लेकर तलवारें हमारे जब जवान निकले
अंग्रेजी सैनिक सारे सर सर भाग निकले
तब वीर जवान चित्तू पांडे ने सत्ते को संभाला था
पड़ा अंग्रेजों को बागी बलिया के जवानों से पाला था
सबसे पहले आजाद हुए हम
सबसे पहले आबाद हुए हम
ऐसे शूर थे हमारे वीर सेनानी
हमनें हमेशा जीतने की ठानी
घर-घर से बरछी ढाल कृपाण कटार निकले
भाग! रे भाग! कह कर सारे शत्रु भाग निकले
हमसे सिंहासन डोला था
जब इन्कलाब हमनें बोला था
हमनें खूब गोलियां चलाई
शत्रु सेना को हमनें मार गिराई
सामने से हमनें गोलियां खाई
पर लड़ी ऐसी लड़ाई,जीत हमारे खेमें में आई
जय प्रकाश नारायण ने तिरंगे को लहराया था
हम झुके नहीं,रुके नहीं जब अंग्रेजों ने कहर ढाया था
बागी बलिया वाले हम
त्यागी बलिया वाले हम
अंग्रेजी सरकार डर कर
रोक लगाई बलिया के जवानों की भर्ती पर
ऐसा हमारा ताना बाना था
हर हिंदुस्तानी आजादी का दीवाना था
मैं उसी बागी बलिया से हूं
आप पूछते हैं," मैं कहां से हूं?"
अभी मैं मार गिराऊंगा
अपनी पहचान बताऊंगा
तब न कहना मार दिया
पापी ने एक संहार किया।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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एक घंटा पहले

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