मैं उपेक्षित
मैं तिरस्कृत
मैं वहिष्कृत
हूं जन्म से,
मैं कर्म से
चमकूंगा
दमकूंगा
कर्ण सा एक दिन
रहूंगा कब तक मैं दीन
हीन,मलीन, गमगीन?
एक न एक दिन
आएगा मेरा दिन
निशा बितेगी
किरणें निकलेंगी
सफलता की
करो बात मत विफलता की।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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