ज़िंदगी के पत्ते झड़ने लगे हैं,
अपने हमसे बिछड़ने लगे हैं।
बातें ख़ामोशी में बदलने लगे हैं,
वक्त जैसे ढलने लगे हैं।
- अंकित कुमार
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