आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

धर्म कहां है?

                
                                                         
                            धर्म के पीछे अधर्म हो रहा है
                                                                 
                            
धर्म कहां सो रहा है?
धर्म कहां खो रहा है?
धर्म के नाम पर
धर्म को बदनाम कर
धर्म के ठेकेदार घर घर घूम रहे हैं
धर्म के ठेकेदार जनता को लुट रहे हैं
धर्म को सत्कर्म से जोड़ो
धर्म को शुद्धता से जोड़ो
धर्म को विज्ञान से जोड़ो
धर्म को कभी न छोड़ो
धर्म मंदिर मस्जिद में नहीं है
धर्म होली ईद में नहीं है
धर्म के ठेकेदार जेल की हवा खा रहे हैं
धर्म के नाम पर हम ठगे जा रहे हैं
धर्म को ढोंग से बाहर निकालो
धर्म की अर्थी मत निकालो।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर