आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अल्पायु के गहन अनुभव

                
                                                         
                            मैंने वक्त से पहले खामियाँ देखी हैं,
                                                                 
                            
जीने से पहले कमियाँ देखी हैं।
बहुतों की नाकामियाँ देखी हैं,
अपने से ज्यादा नादानियाँ देखी हैं।
सपने से ज्यादा दूसरों की मेहरबानीयाँ देखी हैं,
कुछ करने की निशानियाँ देखी हैं।
मैंने अच्छाई से ज्यादा बुराइयाँ देखी हैं,
हाँ, मैंने वक्त से पहले खामियाँ देखी हैं।
जीने के लिए मरते देखा है,
अशान के लिए तड़पते देखा है।
उष्णता से जलते देखा है,
मौत से लड़ते देखा है।
क्यों, मैंने अल्पायु में ही खुद को दहकते देखा है,
दूसरों से ज्यादा अपने जन को कुढ़ते देखा है।
संभलने से ज्यादा गिरते देखा है,
हाँ, मैंने जीने के लिए मरते देखा है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर