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सवेरे की घटा

                
                                                         
                            सुबह-सुबह भास्कर अपनी किरणें बिखेर रहा था,
                                                                 
                            
चांदनी निशा को खदेड़ रहा था।
खग भी वृक्ष पर बैठे कलरव कर रहे थे,
अपनी ही बातों में कुछ कह रहे थे।
सवेरा हुआ अब उठो प्यारे,
सुस्ती अब छोड़ो न्यारे।
वेला को अब समझो प्यारे,
प्रकृति को अब देखो न्यारे।
परमात्मा का दिया वरदान है प्रकृति,
धरती की शान है प्रकृति।
जीवन का श्वास है प्रकृति,
जन की आस है प्रकृति।
जग को यह सिखाती है पक्षी,
मानव को कितना बताती है पक्षी।
पुष्पों की तो बात है निराली,
धरा पे ये खुशबू की रानी।
फसलों की कुछ यही कहानी,
भूख मिटाने की है यह भी रानी।
पानी की कुछ यही निशानी,
प्यासे जन की यही नानी।
यही प्रकृति की सुंदर कहानी,
सुबह-सुबह की सुंदर बरवानी।
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2 महीने पहले

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