हैं तीन तरह के धन
धार्मिक धन
मानसिक धन
आर्थिक धन
हैं और भी धन
स्वास्थ्य धन
चारित्रिक धन
सोचो मन में पहले कि हो धनी तुम
अवचेतन मन में रखो कि हो धनी तुम
निरंतर लगातार सोचो कि हो धनी तुम
फिर काम करो
उस पर विश्वास करो
सर्वोत्तम की आस करो
धन है नदी की धारा
इसका नहीं है कोई किनारा
बहाओ धन की धार
है तुममें छुपी शक्ति अपार
बनो धनी देखेगा सारा संसार।
- सहज कुमार
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X