जहां होता है रोज अपमान
वहां जाता है रोज इंसान
क्या संकट में है प्राण ?
क्यों संकट में है प्राण?
मुठ्ठी भर वेतन के लिए बेच दिया तन
और मन और अपना नील गगन
हाय रे रोटी! कितना अपमान कराएगी तू?
इंसान को और कितना गिराएगी तू?
इंसान को कहां ले जायेगी तू?
इंसान को मृत्यु ही दिलाएगी तू
और कितना इंसान को नीचे धंसाएगी तू?
तू ही बता इंसान को कहां तक ले जाएगी तू?
बास का डांट सहना
सबका व्यंग्य वाण सहना
तो भी मुस्कुरा कर कहना
कोई बात नहीं है
अपमान क्षण भर ही तो है
ऐसे ही इंसान गिरता जाता है
कभी नहीं खुद को संभाल पाता है।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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