मन एक पंछी उन्मुक्त गगन का
,पर बंधा है धागे से इस जीवन का
।पल में ब्रह्मांड की सैर कर आए
,पल में एक तिनके से भी डर जाए
।इसमें उठते हैं विचारों के बवंडर,बाहर है शांत
, पर अशांत है अंदर।कभी मोह की लहरों में बहता है,
कभी वैराग्य की गुफा में रहता है।
इसे जीतना ही सबसे बड़ी जंग है
,जिसने जीत लिया, ईश्वर उसके संग है।
इस कोने में उम्मीदों का दीया जलता
,उस कोने में शंकाओं का साया पलता
।पल में राजा, पल में रंक बना देता,
इसकी मर्ज़ी के आगे कहाँ किसी का चलता!
इसके भीतर ही नफ़रत है,
इसके भीतर ही प्यार छुपा।
इसके भीतर ही कोलाहल,
इसके भीतर ही संसार छुपा।
यह चाहे तो वैराग्य जगा दे,
यह चाहे तो ज़ंजीर बना दे,
सुलझाए तो यह खुद ही ईश्वर,
उलझे तो गहरी ज़ंजीर बना दे।
-अंजनी मिश्रा
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