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वक्त का भोजन है वक्त

                
                                                         
                            वक्त का भोजन है वक्त,
                                                                 
                            
बड़े चाव से खुद को खाता है वक्त।
जो इसके संग चलना सीख गया,
उसे जीवन का अर्थ सिखाता है वक्त।

वक्त से मत भागो, भागोगे तो
और करीब आ जाएगा वक्त।
एक दिन चुपचाप,
तुम्हारे सारे भ्रम खा जाएगा वक्त।

बहस के चूल्हे पर पकता है वक्त,
अहंकार की आँच में तपता है वक्त।
भाप बनकर उड़ जाता है,
मुट्ठियों में कभी नहीं आता है वक्त।

तुम कहते हो -"मैं सब जानता हूँ।"
वह मुस्कुराकर बस इतना कहता है-"अभी बहुत कुछ सिखाएगा वक्त।"

यदि कभी लगे कि वक्त ठहर गया है,
या जीवन जैसे बिखर गया है,
तो फिर से गहरी साँस लेकर
रब का नाम मुस्कुरा कर लेना।
विश्वास का एक बीज फिर बो देना,
एक नया सवेरा लाएगा वक्त।

‘निधि’ वक्त की दवा भी वक्त है और
वक्त का भोजन भी वक्त है।
-अनीता 'निधि'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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