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कवारीं चूड़ियां

                
                                                         
                            सुनाई देती है मुझको किसीकी सिसकिया
                                                                 
                            
भूखे-नंगे बच्चे और उनकी अस्थियां

क्या हुआ ज़माने को लड़ते क्यों हैं
ऐसी क्या हैं उनकी मजबूरियां

रौशन कर रहे हैं वो अपने गली-चौबारे
देखा नहीं मुड़ कर अँधेरे में कितनी झोपड़ियां

जो शज़र काटते रहे तो परिंदे कहाँ जाएंगे
कैसे तै करेंगे वो आकाश की ऊचाइयां

सहमी हे धूप आज कल आँगन में
गूंजती नहीं हैं अब वहां बच्चो की किलकारियां

भुला बैठे हैं बच्चे आज-कल माँ-बाप को
याद आतीं नहीं उन्हें माँ की लोरियां

शहीद जो गया लाल कोई देश के वास्ते
रह गयी कलाई में कवारीं चूड़ियां

खेतो से फसल की खनक आती नहीं
उजड़ रही हे देखो तो कितनी बस्तियां

आखों में नींद आ-आ कर लौट जाती है उसकी
सामने देखता हे जब बड़ी होती बेटियां
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44 minutes ago

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