चित्र बनाया खुद का मैने
इक चेहरा आठ हाथ थे,
चेहरे पर थी झूठी मुस्कान
आठों हाथों मैं अलग अलग काम थे।
इक में थी खाने की जिम्मेदारी
दूजे में झाड़ू पौछा था,
तीजे में बच्चे थे दोनों तो
चौथे मे उनका बस्ता था।
पांचवे में थे पति के कपड़े
छटे में उनका परिवार था।
सातवें में थे थोड़े से पैसे
आठवें में खर्चे अपार थे।
वहीं पड़े थे सपने मेरे
उनपर ना किसी का ध्यान था
यही श्राप था उस चित्र का,
जिसे देर से मैं समझ पाई—
सबका ख़याल रखा जीवन भर,
खुद पर ही न मेरा ध्यान था।
-अनिता शर्मा
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