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चालीस पार

                
                                                         
                            हम हो गए हैं अब चालीस के पार,
                                                                 
                            
चुका दिया जीवन था जिस जिस का उधार।
अब ये जिन्दगी सिर्फ मेरी है ,
जियूँगी वैसे जैसे सामने बैठा हो काल ।
अब किसी की तानाशाही नहीं चलेगी,
जिसे चलानी हो वो नौकर रखे हजार।
अब नहीं सोचूँगी कि कोई क्या कहेगा,
दिन में आईना देखा करूँगी सैकड़ों बार।
अब मन नहीं कि सबसे बात करूं या
मेलजोल रखूँ,
तन्हा ही अच्छा लगता है अब
चाहे वो मेरा बंद कमरा हो
या हो भीड़ से भरा कोई बाजार।
-अनिता शर्मा बुंदेलखंडी
 
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2 महीने पहले

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