जलने वालों से कोई कहे जाकर—
जलन की यह आग तुम्हें सुलगाएगी,
सुलगा-सुलगा कर भभकाएगी।
भभकने का अंत है बुझ जाना,
बुझने का अंत है राख हो जाना।
छीन लेगी यह भभक दिल का सारा सुकून
छोड़ जाएगी एक कालिख सी ज़हन पर!
बुझी राख में होती है न कोई चिंगारी न दहन
बस खाक सी उड़ती फिरती है हर कदम...
न होगी दोस्ती-यारी बस एक खला रह जाएगा,
न वो जोश न जुनूँ बस कुछ जला रह जाएगा!
तो...
ख़ाक हो जाने के लिए ही क्यों जलो?
क्यों न जलो तो दिए की मानिंद
और जगमग कर दो पूरे जहान को!
और सुलगो तो इस तरह—कि
महक जाओ अगरबत्ती की मानिंद,
और सुगंधित कर दो परिवेश को,
मिटा दो सारे अपने द्वेष को।
क्यों न बना दो अपने
जीवन को पूजा का थाल?
प्रेम-चंदन लगा लो भाल...
ईर्ष्या को कर दो दफ़न,
शुद्ध भाव से कर लो हवन,
हासिल कर लो अपनापन !!
हासिल कर लो अपनापन ।
-अनिता दासानी-'अदा'
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