रुखसत हुई जो माँ तो सूना जहाँ हुआ,
हर आँख का हर आँसू समंदर रवाँ हुआ।
हरदम रहे जो साथ, वो पावन दुआ है माँ,
सिर पर रहे ये हाथ, बड़ा मेहरबाँ हुआ।
रावण के दस सिर तो नज़र आ ही जाते हैं,
हर शख्स फिरता है आज चेहरा रंगा हुआ।
रावण का पुतला तो हर साल जलता है,
कब जलेगा अपने अंदर का रावण छुपा हुआ।
बुराइयाँ समेट लो और कर दो भस्म एक बार,
मौक़ा तो दो राम को, जो अंदर दबा हुआ।
विजयादशमी तभी मनेगी, खुशहाली तभी खिलेगी,
निकाल ही दो आज वो गुबार जो कब से मन में भरा हुआ।
देवी माँ की कृपा बरसती रहे यूँ ही हर बार, 'अदा'
विजयादशमी के दीपों से रहे हर आँगन भरा हुआ।
-अनिता दासानी
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