तेरी हर फरेबी अदा में शामिल नहीं हूँ मैं।
ऐसे जज़्बा ओ हुनर के काबिल नहीं हूँ मैं।
बिछड़ने के सौ बहाने ढूँढते फिर रहे हो तुम,
तुम्हारी इस कोशिश से भी ग़ाफ़िल नहीं हूँ मैं।
आँखों में तेरे छल की ज़ुबाँ पढ़ रहा हूँ मैं,
छलावों से रहूँ बेख़बर,जाहिल नहीं हूँ मैं।
आईना दिखा के जो तोड़ दिया तेरे सच का तिलिस्म
कैसे कह दूँ तेरे झूठ का कातिल नहीं हूँ मैं ।
हँसते हुए ग़लत-बयानी पे आपकी ऐ 'अदा' !
ख़ामोश तो रह जाऊँ, पर काइल नहीं हूँ मैं !
-अनिता दासानी,'अदा'
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