यूॅं ही कभी-कभी...
यूँ ही कभी-कभी
मन करता है,
बीते दिनों की तहों में
धीरे से हाथ डालूँ
और कोई ऐसा पल निकाल लाऊँ,
जिसे जीते समय
मैंने उसकी कीमत ही न समझी थी।
यूँ ही कभी-कभी
पुरानी तस्वीरों को नहीं,
उनमें छूट गई आवाज़ों को देखती हूँ।
कितनी सहज थी वह हँसी,
जिसे उस दिन
सिर्फ़ एक मुस्कान समझकर
हम आगे बढ़ गए थे।
यूँ ही कभी-कभी
बारिश की पहली बूँद
हथेली पर गिरती है,
और लगता है
उम्र ने चाहे जितनी दूर पहुँचा दिया हो,
भीतर कहीं
एक बच्चा अब भी भीगने को तैयार बैठा है।
यूँ ही कभी-कभी
माँ की कोई बात
बिना बुलाए याद आ जाती है।
तब समझ में आता है—
माएँ घर छोड़ती हैं,
बच्चों का साथ नहीं।
यूँ ही कभी-कभी
फ़ोन में एक नाम दिख जाता है।
अँगुली आगे बढ़ती है,
फिर ठहर जाती है।
कुछ दूरियाँ
मिटाई नहीं जातीं,
बस हर दिन
थोड़ी-थोड़ी जी जाती हैं।
यूँ ही कभी-कभी
आईने में अपना चेहरा नहीं,
समय का सफ़र दिखाई देता है।
कुछ रेखाएँ उम्र ने दी हैं,
कुछ अपनों ने,
और कुछ
उन बातों ने
जो कभी किसी से कही ही नहीं गईं।
यूँ ही कभी-कभी
भीड़ के बीच
अचानक अपने ही भीतर लौट आती हूँ।
वहाँ कोई शोर नहीं होता,
सिर्फ़ इतने भर का एहसास होता है
कि सबसे कठिन साथ
अपने ही साथ निभाना पड़ता है।
यूँ ही कभी-कभी
मन करता है
उन सबको धन्यवाद कह दूँ
जो बीच रास्ते छोड़कर चले गए।
अगर वे ठहर जाते,
तो शायद
मैं अपने भीतर छिपी हुई
इस स्त्री से कभी न मिल पाती।
यूँ ही कभी-कभी
जीवन
बहुत छोटा नहीं,
बहुत तेज़ लगता है।
देखते-देखते
माँ की उँगली पकड़ने वाली बच्ची
किसी की माँ बन जाती है,
और एक दिन
उसकी तस्वीर भी
किसी और की याद बन जाती है।
इसलिए...
यूँ ही कभी-कभी
जी भरकर हँस लेना चाहिए,
बिना वजह किसी अपने को
गले लगा लेना चाहिए,
बिना किसी अवसर के
"मैं तुम्हें याद करती हूँ" कह देना चाहिए।
क्योंकि
ज़िंदगी हमेशा
बड़े हादसों से नहीं बदलती,
कभी-कभी
एक अधूरी बातचीत,
एक अनकहा स्पर्श,
या किसी का हमेशा के लिए चुप हो जाना
पूरी उम्र का अर्थ बदल देता है।
और तब...
यूँ ही कभी-कभी
आँखें भर आती हैं,
बिना किसी दुख के।
शायद इसलिए कि
कुछ लोग
जीवन से नहीं जाते,
वे हमारी धड़कनों का
उच्चारण बन जाते हैं।
यूँ ही कभी-कभी... बस यूँ ही... जी लेने का मन करता है।
— अनिता चतुर्वेदी
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