ये अनूठी प्रीत के रंग…
ये अनूठी प्रीत के रंग,
किस अज्ञात लोक से आए?
मेरे उर के सूने वन में
किसने दीप जलाए?
नील गगन की निस्तब्धता में
किसकी आहट आती है?
दूर क्षितिज पर ढलती संध्या
किसकी कथा सुनाती है?
चाँदनी से धुली निशा में
जब तारे झिलमिल करते,
पलकों के कोमल आँगन में
अनदेखे सपने उतरते।
मंद पवन जब वन-पथ छूकर
धीरे-धीरे बहती है,
जाने क्यों अंतर्मन में फिर
एक तरंग-सी उठती है।
ओस-कणों में भोर की बेला
जब मोती भर देती,
सूनी डाली पर बैठी कोयल
मधुर तान छेड़ देती।
तुमको देखा नहीं कभी, फिर
मन ने तुम्हें पहचाना,
जैसे किसी अनजाने राग ने
मन का भेद बताया।
तुम्हारा होना—नभ में जैसे
चुपचाप उगा उजियारा,
जैसे तपती धरती पर हो
पहली वर्षा की धारा।
तुम दूर रहे, फिर भी मन ने
तुमको दूर न माना,
विरह तुम्हारी स्मृति बनकर
अंतर में दीप जलाया।
मैंने तुमसे कुछ भी माँगा
नहीं कभी उपहार,
तुम्हारी एक स्मृति ही बन
गई हृदय का संसार।
मैं बूँद बनी बहती रही,
तुम सागर-से गहरे,
मेरी सारी प्यास समेटे
तुम ही रहे मेरे।
ये प्रीत न केवल मिलना है,
न केवल विरह-वेदना,
यह तो उस अनुभूति का नाम
जो बन जाए साधना।
जब जीवन की संध्या उतरे,
सब स्वर मौन हो जाएँ,
तब भी मन की गहरी तह में
ये रंग झिलमिलाएँ।
ये अनूठी प्रीत के रंग—
शब्द जहाँ रुक जाते हैं,
वहीं प्रेम के अर्थ स्वयं
अंतर में खिल जाते हैं।
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
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