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विरह की नव-अनुभूति

                
                                                         
                            विरह की नव-अनुभूति
                                                                 
                            

भीगी पलकें, मौन अधर हैं,
मन में कैसी प्यास जगी,
तेरी छवि को हृदय लगाकर,
फिर भी दूरी शेष रही।

बाहर मेघ बरसते जाते,
भीतर अश्रु बहें अनजान,
तेरे बिन इस सूने मन का
कौन सुनेगा मूक गान?

तेरी स्मृति की शीतल छाया
आज अगन बन छाई है,
जिसे समझा था जीवन-सुख,
वही विरह की परछाईं है।

चित्र तुम्हारा वक्ष लगाकर,
कितनी रजनी बीत गईं,
जिनमें तुमको स्वप्न में पाया,
वे भी भोर में विलीन हुईं।

चाँद खड़ा है मौन गगन में,
तारे पूछें मेरा हाल,
किससे कह दूँ, मेरे प्रियतम,
कितना गहरा विरह-ज्वाल!

तुम तक जाती राह न जाने
किस कुहासे में खो जाती,
मन की विह्वल पगली बदली
बिन बरसे ही लौट आती।

तुम नहीं, पर तुम्हारी आहट
मेरे भीतर साँस भरे,
मैं विरहिणी उस दीपशिखा-सी,
जो आँधी में भी तुम्हें धरे।

न तुम लौटे, न रात ढली है,
न स्मृतियों का अंत हुआ,
तुमसे बिछुड़कर जाना मैंने—
प्रेम विरह में और गहन हुआ।

— अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

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