तुलसी चौरे पर याचना
तुलसी मैया! चरण तुम्हारे,
मन अपना धर आई।
भक्ति-भाव की ज्योति जला कर,
आँखों में नीर सजाई॥
न माँगूँ धन, न माँगूँ यश मैं,
न माँगूँ सुख-संसारा।
बस इतनी-सी दया करो माँ,
हरि चरणन में हो गुजारा॥
तुम्हरी पावन गंध से मैया,
महके मेरा आँगन।
तुम्हरे दल की छाँव में पलकर,
पावन हो यह जीवन॥
जहाँ कहीं हो दुख की बदली,
वहाँ करुणा बरसाना।
सूने मन के आँगन में तुम,
प्रेम-दीप जलाना॥
जिसके नयनों में नीर भरा हो,
उसका दर्द हर लेना।
भटके मन को राह दिखाकर,
हरि-नाम हृदय में देना॥
श्रद्धा मेरी अटल रहे माँ,
सेवा में मन लागे।
दीन-दुखी के आँसू पोंछूँ,
ऐसी शक्ति जगाना॥
तुलसी! तुम तो हरि की प्यारी,
भक्ति तुम्हारी थाती।
तुम्हरे चौरे शीश झुकाऊँ,
मिट जाए मन की भ्रांति॥
प्रेम मिले, करुणा मिल जाए,
दया बसे उर भीतर।
हरि-नाम की सुधि बनी रहे बस,
जनम-जनम के जीवन भर॥
- अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
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