सुरमई अँखियाँ
सुरमई अँखियों से झरकर
प्रेम अमर हो जाता है,
मन का सूना हर कोना भी
फिर से घर हो जाता है।
रूप न रहता सदा जगत में,
नेह सदा मुस्काता है,
सुरमई अँखियों का जादू
युग-युग तक रह जाता है।
जाने कितनी ऋतुएँ इनमें
चुपके-चुपके खेल रही हैं,
मन की सूनी देहरी पर
आशाओं के दीप धरी हैं।
इनकी कोमल एक झलक से
रूठे दिन भी हँस पड़ते हैं,
बुझते मन के निर्जन वन में
नए कुसुम फिर खिल पड़ते हैं।
कितने अनकहे भाव सँजोए,
कितने निर्मल स्वप्न पले,
जैसे नभ की शांत दिशाओं में
अनगिन उजले तारे जले।
जब ये स्नेहिल होकर उठतीं,
डर का हर बंधन टूटे,
मन के भीतर बैठा संदेह
धीरे-धीरे स्वयं ही छूटे।
इनमें छल का नाम नहीं है,
न कोई बनावट की रेखा,
जैसे निर्मल झरना बहता,
वैसा ही इनका है लेखा।
जीवन की इस भागमभाग में
यदि ऐसा विश्वास मिले,
सूखे मन की थकी धरा पर
फिर से सावन-वास मिले।
जो भी इनके पास ठहरता,
अपनेपन का धन पाता है,
एक सरल मुस्कान सहारा बन
जीने का कारण बन जाता है।
सुरमई अँखियों की गहराई
मुझको सागर-सी लगती है,
डूबूँ तो मोती मिल जाएँ,
देखूँ तो दुनिया सजती है।
उनमें सपनों का उजियारा,
उनमें ममता की सरगम है,
एक नज़र भर जो मिल जाए,
जीवन जैसे मधुवन है।
-अनिता चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X