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सोई हुई है....

                
                                                         
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सोई हुई है भोर अभी,
जागा नहीं उजियारा है।
ओस-भीगी पंखुड़ियों पर,
सपनों का पहरा सारा है।

सोई हुई है पगडंडी,
थककर चुप वन की छाँव तले।
पत्तों की धीमी सरगम भी,
ठहरी है अपने भाव तले।

सोई हुई है एक नदी,
लहरों में गहरा मौन लिए।
चाँद किनारे बैठा जैसे,
अपना ही आलोक पिए।

सोई हुई है चाह कोई,
मन के भीतरी कोने में।
जिसे जगाने को धड़कन,
दीपक-सी जलती क्षण-क्षण में।

सोई हुई है प्रेम-कली,
स्पर्श किसी विश्वास का चाहे।
जागेगी जब मंद समीर,
जीवन फिर मधुमास कहाए।

सोई हुई है आशा भी,
पर नींद सदा रहती कब है?
हर तम की गोदी से उगता,
नव सूरज ही जीवन-रब है।

सोई हुई है आज अगर,
कल फिर आँखें खोल उठेगी।
धरती की हर मौन प्रार्थना,
नव प्रभात बन बोल उठेगी।
- अनिता चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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