हवा चली तो दुपट्टा यूँ लहराने लगा,
जैसे कोई ख़्वाब आँखों में मुस्कुराने लगा।
चेहरे पर ठहरी जो शर्म की हल्की लाली,
मौसम भी उस पल इश्क़ फ़रमाने लगा।
दुपट्टा सँभालते-सँभालते दिल सँभल न सका,
नज़र मिली तो फिर कोई राज़ छिप न सका।
उसकी सादगी का भी क्या कहना,
वो दुपट्टे में भी चाँद-सा नज़र आया।
रेशमी दुपट्टा, हवा की रवानी,
चेहरे पे लटकी ज़ुल्फ़ों की कहानी,
वो यूँ गुज़री गली से मुस्कुराकर,
ठहर गई जैसे शाम की जवानी।
दुपट्टे की ओट में सिमटी-सी हया,
आँखों में छुपा कोई मीठा-सा राज़,
सादगी ने जब श्रृंगार किया उसका,
चाँद भी देखता रह गया बेआवाज़।
-अनिता चतुर्वेदी
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