संग-साथ का आशीष~
मंदिर की पावन चौखट पर,
दो मन आज निहाल हुए।
प्रेम नहीं बस साथ मिला,
जीवन के शुभ सवाल हुए।
माथे का यह लाल तिलक,
आस्था का अभिमान लगे।
पीत वसन में सजी सरलता,
मानो धरती पर वरदान जगे।
न हाथों में कोई वैभव था,
न शब्दों का विस्तार था।
बस एक-दूजे की मुस्कानों में,
पूरा जीवन साकार था।
साथ अगर विश्वास का हो,
राह स्वयं आसान बने।
सुख-दुःख की हर कठिन डगर भी,
प्रेम का मधुर विधान बने।
मंदिर केवल पत्थर नहीं,
मन का निर्मल दर्पण है।
जहाँ अहं पिघलकर बह जाए,
वहीं सच्चा समर्पण है।
प्रार्थना बस इतनी-सी है—
यह मुस्कान यूँ ही बनी रहे।
हर मौसम में हाथों का यह साथ,
स्नेह की छाया तले खिला रहे।
ईश्वर की इस पावन देहरी पर,
एक ही वरदान मिला—
जीवन कितना सुंदर होता है,
जब अपना कोई साथ चला।
— अनिता चतुर्वेदी
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