प्रिय के आने से पहले~
आज दर्पण ने
मुझसे कोई प्रश्न नहीं किया,
बस चुपचाप
मेरे चेहरे पर उतरती
एक अनकही मुस्कान पढ़ता रहा।
मैंने बाल नहीं संवारे,
दिन भर की उलझनों को
एक-एक कर सुलझाया है।
माथे पर बिंदी से पहले
मन में विश्वास सजाया है।
कंगन खनके तो लगा,
जैसे प्रतीक्षा ने
अपनी धड़कनों को स्वर दे दिया हो।
पायल बोली तो लगा,
आँगन ने किसी शुभ समाचार की
आहट सुन ली हो।
आज चुनरी का रंग
केवल वस्त्र का रंग नहीं,
मेरे भीतर खिली
नई सुबह का विस्तार है।
अधरों की लाली से अधिक
आँखों में ठहरा
विश्वास सुंदर है।
मैंने इत्र नहीं लगाया,
यादों के फूलों को
धीरे-धीरे मन में खोला है।
उनकी भीनी-सी महक ने
मेरे समूचे अस्तित्व को
एक प्रार्थना बना दिया है।
अब दर्पण में
चेहरा कम,
प्रतीक्षा अधिक दिखाई देती है।
लगता है जैसे
हर धड़कन ने
अपने लिए एक उत्सव चुन लिया हो।
यदि वे आएँगे,
तो उन्हें मेरा श्रृंगार नहीं,
मेरे मन का उजास दिखाई देगा।
क्योंकि प्रेम में
सबसे सुंदर आभूषण
विश्वास होता है,
और सबसे गहरी सुगंध
समर्पण की होती है।
आज मैंने
किसी और के लिए नहीं,
अपने भीतर बसे प्रेम के सम्मान में
स्वयं को सँवारा है।
और यही
मेरे जीवन का
सबसे सच्चा श्रृंगार है।
— अनिता चतुर्वेदी
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