प्रेम की आराधना
दिल में तुझे बिठा लिया,
अब और ठिकाना क्या होगा।
जब तू ही मेरी प्रार्थना है,
फिर कोई बहाना क्या होगा।
बंद नयनों की गहराई में,
तेरा ही रूप सँवरता है।
हर धड़कन के पावन स्वर में,
तेरा ही नाम उतरता है।
न दीप जले, न धूप जले,
न फूलों का अर्पण होगा।
सच्चे मन की निर्मल श्रद्धा ही,
मेरी पूजा का कारण होगा।
जब-जब मन डगमगाएगा,
तेरा विश्वास सँभालेगा।
प्रेम अगर निष्कलुष हो जाए,
ईश्वर भी शीश नवाएगा।
तेरा होना ही उत्सव है,
तेरा मौन ही वंदन है।
तेरी स्मृति का एक क्षण ही,
जीवन भर का अभिनंदन है।
दिल में तुझे बिठा रखा है,
यह कोई क्षणिक कहानी नहीं।
प्रेम जहाँ आराधना बन जाए,
वहाँ दूरी भी विरह नहीं।
नयन मूँदकर जब भी देखूँ,
तू मन-मंदिर में मिल जाता है।
सच्चा प्रेम किसी मूर्ति में नहीं,
विश्वास बनकर बस जाता है।
— अनिता चतुर्वेदी
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