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प्रतीक्षा का वन

                
                                                         
                            प्रतीक्षा का वन
                                                                 
                            

किस पथ पर तुम खोए हो,
किस आकाश के तारे हो?
मैं तो अब भी उसी द्वार पर
आँख बिछाए बैठी हूँ।

दिन आए, फिर दिन बीत गए,
ऋतुएँ कितनी बदल गईं;
लेकिन मन की एक पुकार
आज तलक अनसुनी रही।

आँगन का वह नीम पुराना
मुझसे बातें करता है,
उसकी हर सूनी डाली में
मेरा ही मन बसता है।

पगडंडी पर धूल जमी है,
कोई पदचिह्न नहीं मिलता;
फिर भी मेरा भोला मन
हर आहट पर चौंक उठता।

कभी हवा जब पास से गुज़रे,
लगे तुम्हारा स्पर्श मिला;
कभी किसी पंछी के स्वर में
अपना भूला हर्ष मिला।

लोगों ने समझाया मुझको—
"राहें यूँ कब तक देखोगी?"
मैं मुस्काकर चुप रह जाती,
क्या मन की भाषा कह पाती?

प्रतीक्षा केवल दुख ही नहीं,
यह विश्वास की साधना है;
जो अपने प्रिय को प्रेम करे,
उसकी यही आराधना है।

पर अब इतना जान गई हूँ—
समय किसी पर रुकता कब है?
प्रेम अगर सच्चा होता है,
वह लौटे या न लौटे,
मन में अपना दीपक
जलता ही रहता है।

यदि कभी लौटो तुम फिर से,
मुझको वैसा मत पाना;
मैं आँसू से आगे बढ़कर
मौन का अर्थ जान आई हूँ।

अब मैं राह निहारा करती
ऐसी भोली स्त्री नहीं;
प्रतीक्षा ने मुझको गढ़कर
जीवन का धैर्य बना दिया।

अब मैं केवल प्रतीक्षा नहीं,
धैर्य की एक कहानी हूँ।
जिसने खोकर भी प्रेम बचाया,
मैं वही मौन निशानी हूँ।
-अनिता चतुर्वेदी
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2 महीने पहले

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