आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पिंजरे का पंछी

                
                                                         
                            पिंजरे का पंछी~~
                                                                 
                            

पंख मिले थे नील गगन में
उड़ने के अरमान लिए,
किसने बाँध दिए ये पंख,
किसने सपने छीन लिए?

खिड़की से वह नभ को तकता,
बादल उसके साथी हैं,
दूर क्षितिज पर उड़ते पंछी
उसकी मन की बाती हैं।

सोने की सलाखें चमकें,
फिर भी मन बेचैन रहे,
कैसा वैभव, कैसी शोभा,
जब अपने आकाश न रहे?

दाना-पानी सब मिलता है,
फिर भी भूख नहीं मिटती,
मन की चाहत पंख पसारे,
बंधन में कब तक जीती?

कभी हवा का झोंका आकर
पंखों को सहला जाता है,
बीते नभ की याद दिलाकर
मन को और रुला जाता है।

पिंजरे वाले क्या समझें वे
उड़ने की कीमत क्या होती,
जिसने नभ को छुआ न हो वह
आज़ादी की पीर न ढोती।

एक दिवस ये द्वार खुलेंगे,
विश्वास अभी जीवित है,
टूटे पंखों में भी देखो,
उड़ने की चाह अभी जीवित है।

उस दिन नभ से पूछेगा वह—
क्यों रोका था मेरा सफ़र?
और हवा मुस्काकर बोलेगी—
उड़ना ही था तेरा हुनर।
- अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर