नज़्म: तुझे इल्म भी नहीं है—
तुझे इल्म भी नहीं है,
तेरी बेरुख़ी ने कितने मौसम उजाड़ दिए।
मैंने तो बस एक घर की दुआ माँगी थी,
तूने सफ़र के नक़्शे ही बदल दिए।
तुझे यक़ीन था
कि मोहब्बतें इंतज़ार से आगे नहीं बढ़तीं,
मगर कुछ लोग
अपनी रूह बचाने के लिए
एक दिन बिना आवाज़ दिए
चले जाते हैं।
तू जीतता रहा
अपने तर्कों की अदालत में,
और मैं हारती रही
अपनी ख़ामोशियों की गवाही पर।
अब कभी
मेरी याद तेरे दरवाज़े तक पहुँचे,
तो उसे ठहरने देना,
लेकिन मुझे मत पुकारना।
बस एक बार
आईने में अपना वही चेहरा देख लेना,
जिसने एक सच्चे रिश्ते को
अपने अहम् की भेंट चढ़ा दिया।
मैं लौटूँगी नहीं,
क्योंकि बिछड़ना
मेरी ख़्वाहिश कभी नहीं था।
लेकिन लौटकर
फिर उसी तरह बिखर जाना
मेरी फ़ितरत भी नहीं।
अब मेरी दुआ बस इतनी है—
तुझे हर रिश्ता
पूरी वफ़ा के साथ मिले,
ताकि किसी रोज़
तू ख़ुद समझ सके
कि किसी का साथ मिल जाना
तक़दीर की बात हो सकती है,
मगर उसे निभा लेना
इंसान की असली फ़ितरत का इम्तिहान होता है।
- अनिता चतुर्वेदी
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