नैनों की तो बात नैना जाने हैं
नैनों की तो बात नैना जाने हैं,
शब्द कहाँ हर राज़ बखाने हैं।
जो कह न सकी अधरों की भाषा,
वे भाव नयन ही पहचानें हैं।
एक नज़र में सावन बरसे,
एक नज़र मधुमास बने।
एक चितवन जीवन महकाए,
एक चितवन संन्यास बने।
पलकों की इस भीगी चौखट पर,
कितने मौसम ठहरे हैं।
हँसी ओढ़कर बैठे चेहरे,
भीतर कितने गहरे हैं।
मौन अधर कुछ बोल न पाएँ,
नयनों ने संवाद किया।
एक झुकी-सी कोमल पलक ने,
सारा प्रेम आबाद किया।
काजल की रेखाओं में जैसे,
अनगिन सपने पलते हैं।
जो नयनों को पढ़ना सीखें,
वे ही मन तक चलते हैं।
प्रेम कभी उद्घोष नहीं है,
प्रेम नयन का मौन व्रत है।
जिसने आँखों को पढ़ डाला,
वही सच्चे मन का मित्र है।
नैनों की तो बात नैना जाने हैं,
मन की भाषा मन पहचाने।
जिन रिश्तों में मौन बोलता,
उनको जग क्या समझे, जाने।
— अनिता चतुर्वेदी
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