आज मूर्ख दिवस पर सोचा,
किसे शुभकामना दूँ?
ढूँढ़ रही थी सबसे बड़ी मूर्ख,
फिर खुद से ही पूछूँ—किसे चुनूँ?
आईना बोला—क्यों करती हो,
इतना गहरा विचार?
जिसे ढूँढ़ रही हो तुम बाहर,
वो बैठी है यहीं तैयार!
जो अपनों पर जल्दी विश्वास करे,
हर रिश्ते को दिल से निभाए,
लोगों की छोटी-सी खुशी में भी
अपनी खुशियाँ ढूँढ़ती जाए।
जो चोट मिले तो चुप रह जाए,
फिर भी सबको हँसाती है,
जो खुद टूटे भीतर-भीतर,
दूसरों को जोड़ती जाती है।
हाँ, वही सबसे बड़ी मूर्ख हूँ मैं,
इस बात का गर्व भी है मुझे,
दुनिया चाहे समझे न समझे,
अपनी सादगी प्यारी है मुझे।
तो आज खुद को ही देती हूँ,
मूर्ख दिवस की बधाई,
हे मेरी प्यारी मूर्ख आत्मा!
तूने खूब निभाई अपनी भलाई।
मूर्ख हूँ… मगर दिल की साफ़ हूँ,
और शायद यही मेरी सबसे बड़ी ख़ता है।
-अनिता चतुर्वेदी
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