नीले गगन की शांत छत पर,
बादल चुपचाप ठहर गया।
कुछ कहने की चाह लिए,
अपने भीतर ही बिखर गया।
डाली ने कुछ पूछा उससे,
पत्तों ने भी ली अंगड़ाई।
हवा समझकर मुस्का उठी,
मन की अनकही गहराई।
हर एहसास नहीं बोलता,
कुछ आँखों में ढल जाता है।
कुछ पीड़ा बनकर भीतर,
साँसों संग ही पल जाता है।
मौन बहुत कुछ कह देता है,
जिसे शोर कभी कह न पाए।
मन की सबसे गहरी धड़कन,
शब्दों से भी छिपती जाए।
जीवन की इस लंबी राह में,
सब अपने हिस्से चलते हैं।
कुछ मुस्कानों का दीप जलाते,
कुछ आँसू चुपचाप निगलते हैं।
जो संवेदना को जी लेते,
वे ही सच्चे इंसान कहलाते।
दूसरों के मन का स्पंदन,
अपने हृदय में भी अपनाते।
आकाश, बादल, शाख और पत्ते—
सबका अपना एक विधान है।
जो भीतर की नीरवता सुन ले,
वही जीवन का सच्चा गान है।
-अनिता चतुर्वेदी
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