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लग्न प्रथा का भविष्य

                
                                                         
                            बदल रहा है समय निरंतर,
                                                                 
                            
बदल रहे हैं रीति-रिवाज,
फिर भी मन के प्रेम-सूत्र का
कब बदलेगा सच्चा साज?

सात वचन शायद रह जाएँ,
पर अर्थ नए हो जाएँगे,
बंधन कम, सहचर्य अधिक हो,
रिश्ते सहज बनाए जाएँगे।

न दहेज की कोई परछाईं,
न आडंबर का भार रहे,
दोनों मिलकर घर सँवारें,
दोनों का अधिकार रहे।

कन्या केवल विदा न होगी,
सपनों संग वह जाएगी,
वर भी उसके जीवन-पथ का
साथी बनकर आएगा।

जाति-धर्म की ऊँची दीवारें
शायद धीरे ढह जाएँ,
मन की भाषा समझने वाले
जीवन-साथी बन जाएँ।

विवाह बनेगा समझ-बूझ का,
सम्मान और विश्वास का,
प्रेम जहाँ आधार रहेगा,
रिश्ता होगा खास वहाँ।

रीत पुरानी मिटे न सारी,
संस्कारों की ज्योति जले,
नवयुग की नव सोच के संग
भारतीय परंपरा भी चले।

आने वाले कल का लग्न अब
सिर्फ़ रस्म भर न होगा,
दो स्वतंत्र हृदयों का सुंदर
साझा जीवन-संकल्प होगा।
-अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
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4 घंटे पहले

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