क्रोध और तूफ़ान~
क्रोध जला दे मन का उपवन,
तूफ़ान उड़ा दे घर-द्वार,
दोनों की अंधी गति के आगे,
हार जाता है हर विचार।
जब तक रहता शोर प्रचंड,
कुछ भी समझ नहीं आता है,
थमते ही बिखरे सपनों का
सारा दृश्य नज़र आता है।
क्रोध में बोले कटु वचनों से
रिश्तों का विश्वास टूटता,
तूफ़ानों की तीखी साँसों से
जीवन का आधार छूटता।
क्षणभर का आवेग मगर,
बरसों की पीड़ा दे जाता,
मन के भीतर पश्चाताप का
एक अनंत सागर भर जाता।
इसलिए धैर्य दीप जलाओ,
संयम को अपना सम्मान,
क्रोध और तूफ़ान से बढ़कर
शांत हृदय की होती शान।
जब क्रोध और तूफ़ान थमते हैं,
तब सच अपना रूप दिखाता है;
कितना खोया, कितना टूटा—
तब जाकर मन समझ पाता है।
- अनिता चतुर्वेदी
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