खामोशी के दरमियाँ
खामोशी के दरमियाँ
बहुत-सी आवाज़ें दफ़्न हैं,
जो कभी अदालत तक नहीं पहुँचीं,
न इतिहास की किताबों में दर्ज हुईं।
यह जो चुप्पी है,
किसी संत का मौन नहीं,
यह उन होंठों की विरासत है
जिन्हें सच बोलने की सज़ा मिली थी।
दीवारें अब भी खड़ी हैं,
मगर उनमें घर नहीं बसते।
लोग एक-दूसरे के साथ रहते हैं,
पर किसी के भीतर नहीं उतरते।
कितनी बार
हमने अपने ही शब्दों का गला घोंटा,
सिर्फ़ इसलिए
कि रिश्तों की साँस चलती रहे।
अब शोर से डर नहीं लगता,
डर तो उस सन्नाटे से है
जो धीरे-धीरे आदमी को
उसकी ही नज़रों से गिरा देता है।
एक दिन यही चुप्पी
दरककर बोलेगी,
और तब
सबसे ऊँची आवाज़
किसी नारे की नहीं,
एक साधारण मनुष्य की होगी।
उस दिन समझ में आएगा—
हर बार बोलना साहस नहीं होता,
लेकिन हर बार चुप रह जाना भी
कोई विवेक नहीं होता।
खामोशी के दरमियाँ
कहीं न कहीं
एक सच अब भी साँस ले रहा है,
उसे सिर्फ़ एक ईमानदार आवाज़ का
इंतज़ार है।
- अनिता चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X