फूल-सा स्पर्श
उसने जब चुपके से आकर,
केशों में इक फूल सजाया।
लगा धरा पर प्रेम स्वयं ही,
रूप बदलकर मुस्काया।
न कोई वादा, न कोई कसम,
न कोई शब्दों का व्यापार।
बस एक फूल की कोमल भाषा,
कर गई मन पर अधिकार।
उस स्पर्श की कोमल आभा में,
मन का मौसम बदल गया।
एक नन्हा-सा फूल ही जैसे,
जीवन का संबल बन गया।
नयनों ने नयनों से कह डाला,
जो अधरों से कह न सके।
एक क्षण में ही प्रेम के अर्थ,
जीवन भर के रह गए।
प्रेम अगर सच्चा हो मन में,
आभूषण की चाह कहाँ।
एक फूल ही काफ़ी होता,
जीवन भर की राह वहाँ।
रिश्ते केवल साथ नहीं हैं,
छोटी-छोटी परवाह भी हैं।
बिन कहे जो मन पढ़ ले,
वही प्रेम की सच्ची राह भी है।
उस दिन जाना—
फूल केवल फूल नहीं था,
उसने अपने स्नेह का मौसम
मेरे केशों में टाँक दिया था।
और मैं...
उस एक पल को
आज भी अपनी स्मृतियों के
सबसे सुंदर पृष्ठ पर
सहेजे बैठी हूँ।
— अनिता चतुर्वेदी
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