कमाया झूठ से जो....
कमाया झूठ से जो,
वह भला कब तक टिकेगा?
सत्य की एक चोट से ही,
मिथ्या का मस्तक झुकेगा।
धन अगर चरित्र खोकर
हाथ में आया तुम्हारे,
जान लो, वह राख बनकर
उड़ चलेगा एक दिन सारे।
है नहीं वह वीर, जिसने
छल से रण का मान पाया;
वीर वह, जिसने प्रलय में भी
धर्म का ध्वज ही उठाया।
झूठ की ऊँची अटारी
दूर से भले लुभाती है,
किन्तु उसकी हर शिला में
भय की दरारें बस जाती हैं।
सत्य का पथ अग्निपथ है,
पाँव जलते हैं निरंतर;
पर उसी पर चलने वाला
हो उठता है काल से ऊपर।
शक्ति तलवारों में कब थी?
शक्ति तो संकल्प में है;
विजय केवल बाहुबल की नहीं,
निर्मल आत्मबल में है।
जो स्वयं से हार बैठा,
वह जगत क्या जीत पाएगा?
झूठ का उत्सव क्षणिक है,
सत्य युगों तक गूँज जाएगा।
इसलिए इतना स्मरण रख—
मानव! वैभव से बड़ा चरित्र है;
सिंहासन ढह जाते हैं,
किन्तु सत्य का गौरव अमर है।
- अनिता चतुर्वेदी
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