"इंतज़ार की उम्र"
सफ़र पूरा हुआ,
मगर मंज़िल नहीं आई।
तुम्हारे बाद
घर भी रहा,
दुनिया भी रही,
बस रहने की वजह
कहीं खो गई।
अब मैं
इस झील के किनारे नहीं बैठती,
बल्कि
अपने ही भीतर उतरती हूँ।
-अनिता चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X