हिंदी — मेरे मन की भाषा
माँ की ममता-सी सरल,
गंगाजल-सी निर्मल,
मन के भावों को जो कह दे,
वह भाषा है हिंदी।
माटी की सौंधी खुशबू में,
गाँव की उस चौपाल में,
दादी की मीठी लोरी में,
बसती है मेरी हिंदी।
तुलसी की चौपाई बनकर,
सूर की मधुराई बनकर,
कबीर की निर्भीक वाणी,
मीरा की गहराई—हिंदी।
इसमें ऋतुओं का संगीत है,
इसमें रिश्तों की प्रीत है,
इसमें आँसू भी शब्द बनें,
इसमें हँसती हर उम्मीद है।
ये केवल अक्षर नहीं हैं,
ये सदियों की थाती है,
हर धड़कन में रची-बसी
भारत की परिपाटी है।
दुनिया की हर भाषा सुंदर,
सबका अपना मान रहे,
पर अपनी जड़ों से जुड़कर
हम हिंदी का सम्मान करें।
हिंदी केवल बोल न हो,
जीवन का व्यवहार बने,
अपनेपन की हर अभिव्यक्ति
हिंदी का श्रृंगार बने।
आओ, आज प्रण यह लें—
हिंदी का मान बढ़ाएँगे,
जहाँ मिले अवसर जीवन में,
हिंदी को अपनाएँगे।
मेरी पहचान, मेरी आवाज़,
मेरे मन का मधुर स्पंदन—
हिंदी मेरी आत्मा है,
हिंदी मेरा अपना दर्पण।
हिंदी दिवस पर यही पुकार—
हिंदी का हो सदा सत्कार।
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